लोकपाल बिल के पारित होने की संभावना क्षीण


अगर लोकपाल बिल के मसौदे का यही हश्र होना था तो कहना पड़ेगा कि सरकार को अण्णा हजारे की टीम के साथ बातचीत करने की जरूरत ही क्या थी। सरकार अण्णा के अनशन से पहले प्रधानमंत्री को लोकपाल बिल के दायरे में रखने को तैयार थी मगर इस बीच पता नहीं वह क्यों डर गई और उसने तरह-तरह के तर्क गढ़ लिए।

सरकारी टीम और अण्णा हजारे की टीम के बीच मतभेद इतने गहरे हैं कि अब दोनों टीमों के मसौदे जुलाई में प्रस्तावित सर्वदलीय बैठक में रखे जाएंगे और उसमें जिन-जिन बिंदुओं पर सहमति बनेगी उसके आधार पर कैबिनेट बिल का प्रारूप तैयार करके संसद में पेश करेगी।

चूंकि सरकारी टीम में शामिल पांचों मंत्री कांग्रेस के हैं और प्रमुख प्रतिपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी लोकपाल बिल के प्रारूप पर अपने पत्ते नहीं खोल रही है, इसलिए ऐसा लगता है कि दोनों प्रमुख पार्टियाँ- कांग्रेस और भाजपा-अण्णा की टीम द्वारा तैयार किए गए मसौदे से सहमत नहीं हैं। ऐसे में एक कड़े लोकपाल बिल के संसद में पारित होने की संभावनाएं धूमिल हो गई हैं।

सरकार न तो न्यायपालिका को, न संसद में पैसा लेकर सवाल पूछने और वोट डालने वाले सांसदों के मामलों को, और न ही संयुक्त सचिव के स्तर के नीचे के अधिकारियों के भ्रष्टाचार के मामलों को लोकपाल के दायरे में लाने के लिए तैयार है। यही नहीं, लोकपाल नामक संस्था के चयन और उसके सदस्यों को हटाने के मुद्दों पर भी दोनों टीमों में गंभीर मतभेद हैं।

सरकार सीबीआई और सीवीसी (मुख्य सतर्कता आयोग) को भी लोकपाल के अधिकार क्षेत्र में लाने को तैयार नहीं है। इससे सहज ही यह आभास होता है कि सरकार भ्रष्टाचार रोकने के लिए बनाई जा रही एक संविधानसम्मत स्वायत्त संस्था को ज्यादा से ज्यादा नख-दंतविहीन ही रखना चाहती है। वह ऐसे तर्क दे रही है कि अगर टीम अण्णा का मसौदा मान लिया गया तो लोकपाल नामक एक न्यायिक-प्रशासनिक प्राधिकरण के रूप में एक ऐसी संस्था का जन्म हो जाएगा, जो सरकार से भी ज्यादा ताकतवर हो जाएगी।

टीम अण्णा के सदस्य मतभेद के एक-एक बिंदु पर तार्किक ढंग से स्पष्टीकरण दे रहे हैं मगर सरकार सुनने को तैयार नहीं है। सवाल है कि ऐसी स्थिति में अण्णा हजारे को क्या करना चाहिए? इसका उत्तर यह है कि वे चाहे जो कुछ करें, देश के कोने-कोने में जाकर अलख जगाएं, मगर अब उन्हें अनशन का रास्ता नहीं अपनाना चाहिए क्योंकि अब यह विशुद्ध ब्लैकमेलिंग माना जाएगा।

उन्होंने एक बार अनशन करके सरकार को लोकपाल बिल बनाने के लिए मजबूर कर दिया है, उनका मसौदा भी सभी दलों के सामने रखा जाएगा और फिर संसद ही कड़ा या नरम जैसा भी होगा, लोकपाल कानून बनाएगी। कानून बनाने का काम संसद का ही है और हमारे लोकतंत्र में यह अधिकार न तो कोई उससे छीन सकता है और न ही सांसदों की कनपटी पर अनशन की बंदूक रखकर कोई अपना मसौदा मजबूरन मनवा सकता है।

देश देख रहा है कि अण्णा की टीम का मसौदा सरकार की टीम के मसौदे से कहीं ज्यादा श्रेष्ठ है, इसलिए वे देश के कोने-कोने में प्रचार अभियान चलाकर चुने हुए प्रतिनिधियों पर जनता से दबाव डलवाने का काम तो कर सकते हैं, मगर अब उनका आमरण अनशन करना लोकतांत्रिक नहीं, बल्कि तानाशाही वाला काम माना जाएगा। एक लोकतंत्र सरकार पर दबाव बनाने के जितने भी अन्य अस्त्र उपलब्ध कराता है, वे उनका जरूर इस्तेमाल करें मगर फिर से अनशन न करें।

~ by bollywoodnewsgosip on June 24, 2011.

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