सरकार को सबक सिखाएंगे अण्णा


16 अगस्त करेंगे अनशन, समिति का नतीजा सिफर
लोकपाल विधेयक का आम सहमति वाला साझा मसौदा तैयार करने की सरकार और अण्णा हजारे पक्ष की कोशिशें मंगलवार को विफल साबित हुईं। संयुक्त मसौदा समिति की अंतिम बैठक के बाद गांधीवादी हजारे ने एलान किया कि वह ‘सरकार को सबक सिखाने के लिए’ 16 अगस्त से फिर अनशन करेंगे।

दो महीने में मसौदा समिति की नौ बैठकें होने के बाद भी दोनों पक्षों के बीच मूल मुद्दों पर सहमति नहीं बन पाईं। सरकार ने जोर दिया कि वह ऐसी ‘समानांतर सरकार बनने नहीं दे सकती, जो किसी के प्रति भी जवाबदेह नहीं हो’। सरकार के मसौदे में प्रधानमंत्री, उच्च न्यायपालिका और संसद के अंदर सांसदों के आचरण को लोकपाल के दायरे में लाने का कोई जिक्र नहीं है।

बहरहाल, सरकार के मसौदे में लोकपाल को अर्ध-न्यायिक दर्जा देने, संपत्ति कुर्क का अधिकार देने, स्वतंत्र तरीके से अभियोजन चलाने और पुलिस जैसे पूर्ण अधिकारों के साथ जांच मशीनरी देने के प्रावधानों का उल्लेख है।

सरकार और हजारे पक्ष के बीच कटुतापूर्ण माहौल में हुई बैठकों के बाद पिछली दो बैठकें सौहार्दपूर्ण रही थी। आज की अंतिम बैठक में दोनों पक्षों ने एक दूसरे से असहमत होने की बात को स्वीकार कर लिया। बैठक के बाद विधिमंत्री एम. वीरप्पा मोइली ने कहा कि समिति का मकसद संविधान को दोबारा लिखना नहीं, बल्कि लोकपाल विधेयक का मसौदा तैयार करना था।

हजारे पक्ष निराश : सरकार ने स्वीकार किया कि समाज के सदस्यों के साथ चर्चा से एक मजबूत और सख्त विधेयक का मसौदा तैयार करने में मदद मिली है, जबकि हजारे पक्ष ने सरकार के मसौदे पर ‘निराशा’ जाहिर की।

बैठक के बाद हजारे ने कहा कि सरकार का मजबूत लोकपाल विधेयक बनाने का कोई इरादा नहीं है। वह जनता को गुमराह कर रही है। अब पूर्व की घोषणा के अनुरूप 16 अगस्त से अनशन पर जाने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है। उन्होंने कहा कि सरकार को जनता सबक सिखाएगी। हजारे ने कहा कि आंदोलन संसद के खिलाफ नहीं, बल्कि सरकार के खिलाफ होगा।

…तो संसद का विरोध होगा : केन्द्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा था कि अगर हजारे 16 अगस्त से अनशन करते हैं तो वह संसद के विरोध में होगा। हजारे पक्ष ने कहा कि सरकार ने प्रधानमंत्री, उच्च न्यायपालिका और संसद के भीतर सांसदों के आचरण को लोकपाल के दायरे में लाने सहित लोकपाल के चयन और उसे हटाने की प्रक्रिया संबंधी सभी प्रमुख मांगों को खारिज कर दिया है।

सरकार के मसौदे में लोकपाल को भ्रष्टाचार होने पर स्वत:संज्ञान लेते हुए जांच करने, संयुक्त सचिव स्तर के ऊपर के ओहदे वाले नौकरशाहों के खिलाफ जांच करने, जांच के दौरान अधिकारियों के तबादले और उन्हें निलंबित करने की सिफारिश करने का अधिकार देने के प्रावधान शामिल हैं।

इसमें विशेष अदालतों द्वारा समयबद्ध तरीके से सुनवाई पूरी करने के भी प्रावधान हैं। सरकार का मसौदा कहता है कि सरकारी नौकरशाहों पर अभियोजन चलाने के लिए मंजूरी लेने की जरूरत नहीं होगी।

कई बैठकों में हुई बातचीत के बाद सरकार और हजारे पक्ष लोकपाल के आठ मुद्दों में से किसी पर भी आम सहमति बना पाने में नाकाम रहे। सरकार के मसौदे में कहा गया है कि लोकपाल के अधिकार क्षेत्र में प्रधानमंत्री और सांसदों को छोड़कर अन्य केंद्रीय मंत्री रहेंगे। मसौदे में कहा गया है कि सांसदों के खिलाफ विशेष तौर पर ऐसे किसी भी आरोप को लोकपाल की जांच के दायरे में नहीं लाया जाएगा, जो संसद में अपनी बात रखने या मतदान करने से संबंधित हों।

केंद्र के मंत्रियों ने कहा कि संसद के भीतर सांसदों के आचरण को लोकपाल के अधिकार क्षेत्र में लाना संविधान के तहत उनको मिले संरक्षण का उल्लंघन होगा।

इसलिए प्रधानमंत्री लोकापल के दायरे से बाहर : मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा कि प्रधानमंत्री अब भी भ्रष्टाचार निरोधक कानून के दायरे में हैं और उन्हें किसी भी तरह की छूट नहीं है। सीबीआई उनके खिलाफ जांच कर सकती है। एकमात्र बात यही है कि हम यह अधिकार लोकपाल को नहीं दे रहे हैं। जल संसाधन मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा कि मसौदे में सरकार ने एक रेखा खींचने का फैसला किया और प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे से बाहर रखा क्योंकि वह संसदीय व्यवस्था की धुरी होते हैं।

उन्होंने कहा कि हमने समाज को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने की ईमानदार कोशिश की है। हमने विधेयक का मसौदा तैयार करने की मानक प्रक्रिया से अलग हटकर काम किया। मंत्री ने कहा कि सरकार ने जो विधेयक तैयार किया है वह भ्रष्टाचार से निपटने के लिए अब तक का सबसे कठोरतम विधेयक है।

सिब्बल ने कहा कि हम समानांतर व्यवस्था बनने नहीं दे सकते। पारस्परिक नियंत्रण की व्यवस्था रखना जरूरी है। हम चाहते हैं कि लोकपाल स्वतंत्र और मजबूत रहे, लेकिन उस पर कुछ नियंत्रण हो। उन्होंने कहा कि नियंत्रण कौन रखेगा? क्या हम कार्यपालिका के इतर कोई समानांतर पुलिस रख सकते हैं? क्या हम सरकार से बाहर कोई समानांतर पुलिस बना सकते हैं? यही सवाल आज देश की जनता के समक्ष है। हम समानांतर सरकार बनने नहीं दे सकते।

हजारे पक्ष ने कहा कि सरकार ने जो मॉडल पेश किया है, वह भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए व्यापक, स्वतंत्र और अधिकार संपन्न प्राधिकार बनाने के बजाय लोकपाल के नाम पर महज एक प्रतीकात्मक प्राधिकार बनाने की कोशिश है।

सिब्बल ने कहा कि दोनों ही मसौदों को अगले महीने होने वाली सर्वदलीय बैठक में राजनीतिक दलों के समक्ष रखा जाएगा। बाद में इसे कैबिनेट के समक्ष पेश किया जाएगा।

सरकार की आलोचना : हजारे पक्ष के प्रशांत भूषण और अरविंद केजरीवाल ने कहा कि सरकार के मसौदे से यह स्पष्ट हो जाता है कि सत्तापक्ष लोकपाल पर नियंत्रण चाहता है क्योंकि उसकी चयन समिति में सरकार के पांच राजनीतिक सदस्य होंगे। भूषण ने कहा कि वे सरकार के मसौदे से बेहद निराश हैं।

सरकार की आलोचना करते हुए केजरीवाल ने कहा कि पूर्व में मसौदे में कम से कम प्रधानमंत्री लोकपाल के दायरे में थे, लेकिन अब सरकार ने जो मसौदा तैयार किया है, उसमें प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे से बाहर रखा गया है। हालांकि, भूषण ने कहा कि इस लंबी कवायद से ‘कुछ हासिल’ भी हुआ है।

~ by bollywoodnewsgosip on June 22, 2011.

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