सड़ता अन्न, दम तोड़ते अन्नदाता


अन्न की बर्बादी एक अपराध है’ अनाज की बर्बादी पर सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी गरीबों की पीड़ा को व्यक्त करने वाली है। अनाज को सड़ाने के बजाय जरुरतमंदों में बांटने के सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद राज्य सरकारों के कान पर जूं तक नहीं रेंगी और हर साल की तरह फिर मध्यप्रदेश और पंजाब में हजारों बोरी गेंहू बिना किसी रखरखाव से सड़ गया। इंद्र देव की ‘कृपा’ पर आश्रित राज्य सरकारें अन्न भंडारण की चुनौती के आगे बेबस नजर आ रही हैं।

मध्यप्रदेश सरकार बड़ी शान से सीना चौड़ा कर बताती है कि उसने इस साल सबसे ज्यादा गेंहू खरीदा है। पर पिछले दिनों एकाएक आई बरसात ने इस गर्व भरे दावे को ‘सड़ा’ दिया। इंदौर जैसे प्रमुख नगर सहित कई अन्य जगहों पर आई बरसात ने खुले में रखी गेंहू की हजारों बोरियों को पानी में भिगो दिया। समुचित रखरखाव न होने से खुले में पड़ा यह गेंहू भीगने के बाद अब सड़ना शुरू हो गया है।

गेंहू की रिकॉर्ड फसल के लिए माने जाने वाले पंजाब के मोगा जिले में तो लापरवाही का आलम यह है कि पिछले तीन साल से गेंहू की हजारों बोरियां खुले में पड़ी हैं। अब तो यह अनाज इतना खराब हो चुका है कि जानवर भी इसे नहीं खा सकते।

निराशा की गर्त में : दूसरी ओर भारत के अन्नदाता किसान निराशा के भंवर में फंस कर लगातार आत्महत्या कर रहे हैं। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2009 में 17 हजार से अधिक किसानों ने आत्महत्या की। ब्यूरो के अनुसार 2009 में महाराष्ट्र में 2872 जबकि आंध्रप्रदेश में 2474 किसानों ने आत्महत्या की। 2010 से फरवरी 2011 तक सिर्फ मध्यप्रदेश में 348 किसानों ने आत्महत्या की है। विदर्भ से लेकर बुंदेलखंड में यह दुखद आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है।

हाल ही में सामने आई कुछ रिपोर्टों में भारत में भुखमरी से संबंधित चौकाने वाले आंकड़ें सामने आए हैं। विश्व खाद्य कार्यक्रम (डब्लूएफपी) और स्वास्थ्य मंत्रालय, 2010 में भारत द्वारा जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार कुछ आंकड़ें सहारा के आस पास के अफ़्रीकी देशों में पाए जाने वाले भुखमरी के संकेतकों से भी कहीं अधिक खराब हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में भुखमरी से पीड़ित लगभग 50 प्रतिशत लोग भारत में निवास करते हैं।

इसी तरह भारत के लगभग 35 करोड़ लोग न्यूनतम ऊर्जा आवश्यकताओं के हिसाब से 80 प्रतिशत से भी कम भोजन का उपभोग कर पाते हैं। भारत में बाल मृत्यु के लगभग 50 प्रतिशत मामलों का कारण कुपोषण है। इस रिपोर्ट में 2010 में भारत भुखमरी से संबंधित वैश्विक सूचकांक में 119 देशों में 94 स्थान पर है।

जिम्मेदार कौन : जिस देश में करोड़ों लोग पेट भर भोजन न कर पाते हों वहां सरकारी गोदामों में हजारों टन अन्न की बर्बादी शर्मसार करने वाली है। सरकारी गोदामों में अनाज के बर्बाद होने का यह पहला मामला नहीं। पिछले कई वर्षो से यह शर्मनाक सिलसिला कायम है। संप्रग सरकार 2004 से सत्ता में है और खास बात यह है कि तब से कृषि एवं खाद्य मंत्रालय पर शरद पवार ही काबिज हैं।

पिछले साल केंद्रीय कृषि एवं खाद्य मंत्री शरद पवार ने लोकसभा में 11 हजार टन खाद्यान्न के खराब हो जाने की बात स्वीकारी थी। देश में एफसीआई के गोदामों में कुल 11 लाख 708 टन अनाज खराब हुआ है।

एक जुलाई 2010 की स्थिति के अनुसार भारतीय खाद्य निगम के विभिन्न गोदामों में 11,708 टन गेंहू और चावल खराब हो गया है।

वर्ष स्थिति
2009 – 2010 2 हजार टन गेहूं और 3680 टन चावल खराब हुआ
2008 – 2009 947 टन गेंहू और 19,163 टन चावल खराब हुआ
2007 – 2008 924 टन गेंहू और 32 हजार 615 टन चावल खराब हुआ
कुल : तीन साल साल में लगभग 58 हजार टन अनाज खराब हुआ।

इस तरह इस साल तक खराब हुए अनाज को अगर मिला लिया जाए तो चार साल में देश में सरकारी स्तर पर कुल 71 हजार 47 टन अनाज यूं ही बरबाद हो गया है।

लाभ का खेल : जो सरकार अनाज को सड़ते देख आंखे मूदें है, खाद्य पर्दार्थों की दिनोंदिन बढ़ती कीमतों को तर्कसंगत ठहराती हो वह विदेशों से अनाज का आयात करने में जरा भी देरी नहीं लगाती। जिस तत्परता से यह काम होता है उससे उच्च पदों पर काबिज ताकतवर मंत्रियों और अफसरों पर उंगली उठना स्वभाविक है। पर क्यों, ऐसा इसलिए होता है कि इससे ‘कुछ लोग’ बहुत आसानी से लाभान्वित हो जाते हैं।

दुनियाभर में विदेशी कॉर्पोरेट कंपनियां अनाज जैसी महत्वपूर्ण कमोडिटी पर नियंत्रण रखने के लिए सत्ता के दलालों को मुंहमांगी कीमत देते हैं। इसमें खुले बाजार, बहुराष्ट्रीय कंपनियों और संपन्न देशों के स्वार्थनिहित हैं। देशी-विदेशी कंपनियां अपने व्यापारिक हितों के लिए चाहती हैं कि सरकार का खाद्यान्न संग्रहण और व्यापार पर से नियंत्रण पूरी तरह समाप्त हो जाये, ताकि वे मनमाने दाम पर अनाज बेचकर भरपूर मुनाफा कमा सकें।

उदाहरण के तौर पर इस वर्ष भंडारण की समस्या से जूझ रही एफसीआई ने डिसेंट्रलाइज प्रोक्योरमेंट (डीसीपी) वाले राज्यों में चावल की खरीफ पर रोक लगा दी है। यही वजह है कि चावल की खरीद का लक्ष्य पूरा नहीं हो पाया है। डीसीपी राज्यों में एफसीआई अनाज की सीधी खरीद नहीं करती है। राज्यों की खरीद एजेंसियां एफसीआई के लिए अनाज खरीदती हैं। इस अनाज का उपयोग वहां की सार्वजनिक राशन प्रणाली में किया जाता है, जिससे लागत कम हो जाती है।

व्यापारी व निजी कंपनियों इस समस्या को समझती हैं इसीलिए उन्होंने खरीद शुरू होने के साथ ही इन 11 राज्यों में अपना तंत्र फैला लिया। गेहूं का सर्वाधिक उत्पादन करने वाले राज्यों जैसे उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश में कारगिल और आईटीसी जैसी बड़ी कंपनियों ने अपना खरीद केंद्र खोला हैं।

स्थानीय मंडियों के आढ़तियों को इन कंपनियों ने अपना खरीद एजेंट बना दिया है, जिसके मार्फत ये खरीदते हैं। पर पुराने अनाज के भारी स्टॉक की वजह से फिलहाल गोदामों की कमी है। इसके मद्देनजर खरीद एजेंसियां गेहूं खरीद की गति धीमी ही रखेंगी।

कुछ कंपनियां गेंहू को किसानों से सस्ते दामों में खरीद कर दाम बढ़ने का इंतजार करती हैं। इनके निजी वेयर हाउस में इस अनाज को दबा लिया जाता। इस उठापटक में भाव बढ़ाने के लिए सारे उपाय अपनाए जाते है। कालाबाजारी से लेकर सट्टा बाजार तक में तेजी-मंडी का खेल तो पुराना हो चुका है।

नाकाफी कानून : केंद्रीय सरकार गरीबों का पेट भरने के लिए खाद्य सुरक्षा कानून बनाने की आवश्यकता तो समझ रही है, लेकिन सड़ते हुए अन्न को बचाने के लिए अब तक कोई ठोस उपाय नहीं सोचा गया है। अब यदि अन्न भंडारण की उचित व्यवस्था नहीं की जा सकी तो खाद्य सुरक्षा कानून के तहत गरीबों को यही सड़ा-गला मिलेगा।

दुर्भाग्य है कि जिन जिम्मेदारों के हाथों में इस अनाज की वितरण व्यवस्था है उनके परिजनों को कभी भूखे नहीं सोना पड़ा है। न ही उनके किसी अपने को भूख से तड़पते हुए जान देनी पड़ी है। जिन्होने सपने में भी भूख नहीं देखी उन लोगों को दो जून की रोटी को तड़पते लोगों की व्यथा कभी समझ नहीं आएगी।

~ by bollywoodnewsgosip on May 30, 2011.

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