विश्व चैम्पियन जीते जरूर मगर..


जिस चीज का डर रिकी पोंटिंग की सेना को था, वही चीज अहमदाबाद के मोटेरा स्टेडियम में सोमवार को हुई और लगातार तीन विश्वकप में जीत का सेहरा बाँधने वाली ऑस्ट्रेलियाई टीम को जिम्बाब्वे जैसे ‘मेमने’ को हराने में भी पसीने छूट गए। आप मैच के परिणाम (91 रनों से जीत) को कुछ देर के लिए भूल जाइये और ये याद रखिये कि मुकाबला ऑस्ट्रेलिया और जिम्बाब्वे के बीच था। यानी शेर और बकरी की लड़ाई…

ग्रुप ‘ए’ के इस मैच में अँगुली की सर्जरी करवाकर पहली बार मैदान में उतरे ऑस्ट्रेलिया के कप्तान रिकी पोटिंग ने सिक्का जीतकर पहले बल्लेबाजी इसलिए चुनी ताकि उनकी टीम एक बड़ा स्कोर (300 से पार) खड़ा करें जैसा कि दूसरी कमजोर टीमों के खिलाफ भारत और श्रीलंका ने खड़ा किया था।

टॉस के वक्त ही मोटेरा के विकेट से कप्तान पोटिंग जरा भी खुश नजर नहीं आए क्योंकि उनकी आदत तेज विकेटों पर खेलने की रही है। उनके गुस्से को बढ़ाने का काम साथी बल्लेबाजों ने कर दिया। 45 ओवर पूरे हो चुके हुए थे और स्कोर बोर्ड पर ऑस्ट्रेलिया के 4 विकेट खोकर 207रन ही टँगे थे।

क्या आप इस विश्व विजेता टीम की तुलना जिम्बाब्वे जैसी टीम से कर सकते हैं? यदि नहीं तो यह भी जान लीजिये कि जिम्बाब्वे ने भी 45 ओवर में स्कोर को 168 रनों तक ले जाने का साहस दिखाया था। यह बात अलग है कि तब तक उसके 9 बल्लेबाज ड्रेसिंग रूम में शीतल पेय से गला तर कर रहे थे।

यदि आधुनिक क्रिकेट में हैलमेट पहनने की प्रथा नहीं होती तो आज जिम्बाब्वे के बल्लेबाज रे प्राइस की नाक और टुकड़े-टुकड़े हो चुकी खोपड़ी की सर्जरी किसी अस्पताल में चल रही होती। मैदान पर जिम्बाब्वे की आखिरी जोड़ी क्रिस मोफू और प्राइस की जोड़ी टूट नहीं रही थी और इसी से बौखलाए शॉन टैट ने 46वें ओवर की चौथी गेंद ऐसी सनसनाती हुई डाली कि वह टप्पा खाने के बाद सीधे उनके हैलमेट से टकराई।

इसके बाद प्राइस की रही सही हिम्मत भी जाती रही और अगले ही ओवर की दूसरी गेंद पर मिशेल जॉनसन ने मोफू का शिकार करके ऑस्ट्रेलिया को मैच में 91 रनों से जीत दिलवा दी।

ऑस्ट्रेलिया की यह जीत उतने मायने नहीं रखती जितना मायने यह कि ऑस्ट्रेलियाईयों के दिमाग में यह कीड़ा कुलबुला रहा होगा कि उपमहाद्वीप के धीमें विकेटों से कैसे निपटा जाए? ऑस्ट्रेलिया जैसी ताकतवर टीम के बल्लेबाज जिम्बाब्वे के सामने लड़खड़ाते नजर आए।

चूँकि शेन वॉटसन इंडियन प्रीमियर लीग में खेल चुके हैं, लिहाजा भारतीय विकेटों की तासीर से कुछ परिचित थे। यही कारण है कि वे 113 मिनट तक क्रीज पर रहने के बाद 92 गेंदों में 79 रन बनाकर ‘मैन ऑफ द मैच’ बने।

वॉटसन के अलावा माइकल क्लार्क 58 रनों पर नाबाद रहे। क्लार्क ने मिशेल जॉनसन को साथ लेकर मैच की आखिरी 30 गेंदों में 55 रन जोड़े जिससे स्कोर 262 रन तक पहुँच सका। वॉटसन और क्लार्क को छोड़कर ऑस्ट्रेलिया का कोई भी बल्लेबाज 30 रन के भीतर ही आउट हुआ।

पोंटिंग की मजबूरी देखिये कि उन्हें जिम्बाब्वे के 10 विकेट लेने के लिए 7 गेंदबाजों को मोर्चे पर लगाना पड़ा। ऑस्ट्रेलिया की तेज गेंदबाज ‘पेस’ के चक्कर में दिशाहीन गेंदबाजी करते रहे। सिर्फ टैट ने जिब्बाब्वे के एक खिलाड़ी ब्रेंडन टेलर के डंडे बिखेरे। 2 बल्लेबाज पगबाधा और शेष बल्लेबाज कैच आउट हुए।

यदि जिम्बाब्वे के पास भारत जैसे एक दो खिलाड़ी होते तो आज ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी होटल के कमरों में हार का मातम पसरा होता। जिम्बाब्वे बिलकुल नई नवेली है और दिसम्बर 2010 में बांग्लादेश के हाथों 3-1 से वनडे सिरीज हारकर आई है, उसका विश्वविजेता के सामने ऐसा प्रदर्शन करना, मैच हारकर भी दर्शकों का दिल जीतने वाला माना जाएगा।

बहरहाल, ग्रुप ‘ए’ में जिम्बाब्वे को न्यूजीलैंड और कनाडा से खेलना है। और सोमवार को किया गया प्रदर्शन आगे भी जारी रहता है तो यह टीम जरूर जीत का जश्न मनाएगी। इस टीम में जोश है, दम है, और मैदान में जौहर दिखाने की असीम क्षमता भी तो है। है तो सिर्फ अनुभव की कमी..

Msn India

~ by bollywoodnewsgosip on February 22, 2011.

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